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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Friday, 3 April 2015

हमर सौतिन - मैथिली चलचित्र समीक्षा

हमर सौतिन

(मैथिली फिल्म समीक्षा)


                    आइ पहिल बेर कोनो मैथिली चलचित्रकेँ छविगृहक पर्दा पर देखबाक अवसरि प्राप्त भेल । एहिसँ पहिने जखन कोनो मैथिली फिल्म सिनेमा हॉलमे लगैत छल हम बाहरे रहैत छलहुँ आ जा धरि कोनहु अवकाशमे गाम अबैत छलहुँ ता धरि फिल्म छविगृहक देहरि नाँघि चुकल रहैत छल । परञ्च देखैत अवश्य छलहुँ – सी॰डी॰ वा डी॰वी॰डी॰ पर । देखने तऽ ओहो फिल्म सभ छी जकर सी॰डी॰ नञि बनल, जेनाकि ममता गाबए गीत, कन्यादान, भौजी माए – दूरदर्शन पर । खैर, प्रेक्षागृहक हमर ई पहिल मैथिली फिल्म आ तेँ विशिष्ट फिल्म छल – “हमर सौतिन” ।

             फिल्मक कथावस्तु निश्चित रूपेँ सर्वसामान्य थिक । बहुतो दर्शकलोकनिकेँ एकर साम्य जितेन्द्र युगक कोनो हिन्दी फिल्म वा कोनो आन मैथिली फिल्मक कथावस्तु सदृश बुझि पड़ैत छन्हि । फिल्मक कथावस्तु बेमेल बियाह (शैक्षणिक रूपेँ) पर आधारित अछि आ एहि बेमेल बियाहक परिणाम जे सभ होइत अछि से एहि फिल्मकेँ दिशा प्रदान करैछ । स्व॰ राजकमल चौधरीक “ललका पाग” केर नायकक डेग अन्ततः ठमकि जाइत छन्हि परन्तु एहि फिल्मक नायकक डेग एकाएकी क्रमशः बढ़िते चलि जाइत छन्हि । आ ई बढ़ैत डेग जे – जे करओलक से पर्दा पर अभिनित भेल ।

                   कथावस्तु किछु एकरंगाह होइतहुँ एहि फिल्मकेँ विशिष्ट बनबैत अछि – विशिष्टे नञि, अपितु सर्वथा विशिष्ट बनबैत अछि - एकर पटकथा, एकर संवाद, एकर छायांकन वा फिल्मांकन, एकर गीत-नाद आ एकर गीत-नादक राग-भाष वा संगीत । फिल्मक छायांकन विशुद्ध एखनुका मैथिल परिवेश मे कयल गेल अछि । एखनुका परिवेश जाहिमे मैथिल मिथिला आ मिथिलासँ बाहर अर्थात् मिथिलेतर क्षेत्रसभमे विभिन्न परिस्थितिमे संघर्षरत छथि ।

                 वास्तवमे डायलॉगक शब्द जाहि भाषामे बाजल जाइत अछि, ओकर उच्चार (Pronunciation / Phonetics / Phoenetics)  सेहो ओहि भाषाक अनुरूप होयबाक चाही । मैथिलीमे बहुतो शब्द जेना लिखल जाइत अछि वस्तुतः तेना बाजल नञि जाइत अछि । उदाहरणक लेल “अछि” केर सर्वसामान्य उच्चारण भेल “अइछ” जँ ओकरा “अछी” या “अऽछी” या “ओछी” बाजल जायत तऽ अनसोहाँत लागत आ दर्शककेँ प्रतिकर्षित करत । ई समस्या बहुतो मैथिली फिल्ममे दृष्टिगोचर भेल अछि । पर, एहि फिल्ममे ई दोष कोनहु पात्रक संवाद-कथनमे वा डायलॉग-डिलिवरीमे नञि आयल अछि । सर्वसामान्य उच्चारणक प्रयोगसँ डायलॉग सुनबामे कठाइन नञि लगैत अछि अपितु कर्णप्रिय आ रुचिगर लगैछ । संगहि संवाद-कथन कोनो पोथी वाचन नञि थिक । पोथीमे वा कागज पर मात्र शब्द लिखल वा टंकित कयल रहैत अछि – जकर कि कोनो विशिष्ट अर्थ होइत अछि । पर, ओहि शब्द वा पाँतीक मात्र अर्थे टा नञि होइछ – ओहि मे ओकर भाव सेहो निहित रहैत अछि । एहि भावक बिना संवाद-कथन पोथी-वाचन सदृश निर्जीव भऽ जाइत अछि आ ओकर विशिष्ट भावक संग कयल गेल संवाद-कथन सजीव भऽ उठैछ । एहि मैथिली चलचित्रमे हरेक अभिनेता ओ अभिनेत्री अपन अभिनयकेँ सजीवता प्रदान करबा मे सफल भेलाह अछि । संवाद-कथन या डायलॉग-डिलिवरी कृत्रिम नञि भऽ कऽ सहज आ प्राकृतिक लगैत अछि । अभिनय ओ संवाद परस्पर सहयोगी भऽ पुर्ण भावाभिव्यक्ति करैछ ।

           एहेन अभिनय ओ संवाद-कथन केर जँ उचित पार्श्व संगीतक सहयोग भेटि जाय तऽ कहबे की – सोन मे सुगन्धि । सएह भेल अछि एहि फिल्ममे । संगीत पक्ष केर जादू मात्र पार्श्व संगीते नञि, फिल्मक गीत-संगीत पर सेहो चलल अछि । गीत एहेन जे बेर – बेर सुनबाक ओ संगहि गयबाक मोन करत । संगीत एहेन जे तकर ताल पर वा बीट्स पर अपनहि-आप मोन थिरकए लागत जकर अभिव्यक्ति दर्शकक वा श्रोताक हाथ आ पएरक आङ्गुरक थिरकनसँ सद्यः देखल जा सकैत अछि । एहि फिल्ममे प्रयुक्त पारम्परिक गीतसभमे सेहो एकटा नऽव प्रकारक द्रुत (फास्ट) बीट्स बला संगीतक प्रयोग कयल गेल अछि जाहिसँ ओकर मौलिकता प्रभावित नञि भेल अछि आ संगहि गीत सभमे नऽव जान-पराण आबि गेल अछि । एहने गीत आजुक युवा वर्गक मांग सेहो थिक ।





                      एतबाक बादो किछु चीज जरूर अखरैत अछि । पहिल तऽ मैथिली फिल्मक पोस्टर पर “.......... की प्रस्तुती” छपल होयब । दोसर, फिल्मक बीच–बीचमे ठाम–ठाम धुम्रपानक चेताओनीकेँ हिन्दीमे देखाएब । खैर, ई सभ फिल्मक अंश नञि अछि । फिल्ममे बियाहक बादसँ लऽ कऽ मध्यान्तर धरि राधाक घोघ निपत्ता अछि । कने काल केर लेल मानि लियऽ राधा अनपढ़ छलीह, गँवार छलीह पर सासुरमे घोघ नञि करब वा कम सँ कम माथ पर नुआ नञि लेब फिल्मक कथावस्तु पर नञि बैसैत अछि । आ जञो कहैत छी जे अनपढ़ होयबाक संग – संग बताह सेहो छलीह तऽ फिल्मक उत्तरार्धक कथाबस्तुसँ मेल नञि खाइत अछि । फिल्ममे एतेक सभ भेलाक बादो राधाक सासुक चुप्पी वा उदासीनता किछु पचैत नञि अछि । कोनो माएक सहज मनोविज्ञानसँ मेल नञि खाइत अछि । फिल्मक पहिल रीलमे अवाज सेहो किछु कम स्पष्ट बुझना गेल पर तकरा बाद से त्रुटि पुर्ण रूपेण सुधरि गेल अछि ।

              फिल्मक परिप्रेक्ष्य पुर्णरूपेण सामाजिक आ पारिवारिक अछि । हाँ, एहिमे कतहु – कतहु युगकेँ देखैत किछु नऽव प्रयोग अवश्य भेल अछि जे कि समीचीन थिक । फिल्म “सिनेमास्कोप” मोड मे बनल अछि; घरेलु विडियोग्राफीबला कैमरासँ नञि बनाओल गेल अछि । तेँ पैघ पर्दा पर चित्र फटैत नञि अछि । पैघ पर्दा पर - खास कऽ आयताकार पर्दा पर – चलचित्र बड्ड सुन्नर लगैछ । हम एहि फिल्मक मुल्यांकनमे कतेक सही छी आ कतेक गलत – से तऽ आन दर्शकलोकनि फिल्म देखलाक बात बतओताह । तेँ सभ मैथिलजनसँ निवेदन जे एहि फिल्मकेँ एक बेर अवश्य देखू आ अप्पन सहमति वा असहमति नीचाँ कमेण्टक रूपमे जरूर लीखू ।


- डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”

Tuesday, 10 March 2015

पद्य - ९९ - मैट्रिकक तैय्यारी

मैट्रिकक तैय्यारी


साटा पर  कत’ मैच  खेललियै 

कतहु खेललियै, कतहु देखलियै


पएर  तर  बगरा, बाप रौ बाप !*‍१
आब की करियै, आहि रौ बाप ! !

नओमाकेँ हम किछु ने बुझलियै ।
भरि नओमा हम खेलि गमेलियै ।
कहुना नओमा पास भऽ गेलियै ।
छओ महिना फेर खुशी मनेलियै ।
मैट्रिकमे   दसमेक  पुछै  छै,  नओमामे  तेँ  बेपरवाह ।*
पएर  तर  बगरा, बाप रौ बाप ! !

दूर्गापूजा   खूब   घुमलियै ।
नाटक, थेटर, नाच देखलियै ।
दियाबाती  छठि*३ मनेलियै ।
फॉर्म बोर्ड केर, सेहो भरलियै ।
दसमा केर सिलेबस एतबे, चारि मासमे दस – दस चास ।
पएर  तर  बगरा, बाप रौ बाप ! !

ठण्ढी   आ  शीतलहरी   एलै ।
साटा पर  कत’ मैच  खेललियै ।
कतहु खेललियै, कतहु देखलियै ।
जीत – हारि दुनु खूब मनेलियै ।
पढ़बा कालमे ठण्ढी लागय, ट्वेण्टी – ट्वेण्टी केर उछाह ।
पएर  तर  बगरा, बाप रौ बाप ! !

नऽव  बरख,  बनभोजो  केलियै ।
मंगलमयक   सनेश    पठेलियै ।
लाई, चुड़लाई आ तिलबा खेलियै ।
खिच्चरि – दऽही   संगे  देलियै ।
प्रात भने  बुझना  गेलै, छै मास एक मैट्रिक केर – आह !
पएर  तर  बगरा, बाप रौ बाप ! !

“एटम बम” कण्ठस्थ रटलियै ।*
“गेस पेपर” केँ  खूब चटलियै ।*
महाबीरजीकेँ      गोहरेलियै ।*
जोड़ा - छागर कबुला केलियै ।*
हाथ परीक्षाफल आयल तँऽ,  जेना  सूँघि नेने हो  साँप !
पएर  तर  बगरा, बाप रौ बाप ! !


*१ - पएर तर बगरा, बाप रौ बाप – ई एकटा बुझौअलि अछि जकर मतलब होइत अछि “आगि” ।
*२ – आइ काल्हि बहुत रास धियापुता मोनमे ई विचार बहुत दृढ़तासँ पोषने रहैत छथि कि मैट्रिक केर पाठ्यक्रममे मात्र दशमे वर्गक पाठ्यक्रमसँ पूछल जाइत अछि । ई विचार अत्यन्त भ्रामक अछि । उदाहरणार्थ जँ नओमाक रसायनशास्त्रमे परमाणु संरचना, संयोजकता आदि नञि पढ़ने छथि तँऽ हुनिकालोकनिकेँ दशमाक रासायनिक बन्धन, रासायनिक समीकरण संतुलन आदि कोना कऽ बुझबामे अओतन्हि ।
*३ - उच्चारण भेल “छइठ” ।
*४ – “एटम बम” – एक प्रकारक अति सम्भावित प्रश्न सभक पुस्तिका थिक, जकर नाँव सँ मिथिलाक बच्चा – बच्चा (आ तेँ पैघलोकनि सेहो)  चिर – परिचित छथि । ई कोनो “बम” वा “बम बनएबाक पुस्तिका” नञि अछि ।
*५ – “गेस पेपर” – एहि नाम सँ तँऽ पूरा देशे सुपरिचित अछि ।
*६ आ *७  – महाबीरजी वा अप्पन – अप्पन आन आराध्य देवी – देवता सभक परिचायक ।



'विदेह' १७२म अंक  १५ फरबरी २०१५ (वर्ष मास ८६ अंक १७२) मे प्रकाशित । बलानां कृतेमे ।

Saturday, 7 March 2015

पद्य - ९७ - भेटत मजूर कतऽ - मिथिलाकेर बच्चा

भेटत मजूर कतऽ - मिथिलाकेर बच्चा





चुनावक बोखार छै,
सभ केओ बेहाल छै,
तकनहु  भेटैछ   केओनेता  ने  सुच्चा ।।

मिथिलाक आँच पर,
रोटी अछि सेकि रहल,
मिथिलेकेँ  बेचि  रहल,  लबड़ा  आ लुच्चा ।।

भाषणमे मिथिला छै,
भाषणमे मैथिली,
घऽर  ओकर – मैथिली  बूझय  ने  बच्चा ।।

मिथिलाक जनगण छै,
दिल्ली आ पटना लए,
भोटक  जोगार  बस,  जीत   बुझू  पक्का ।।

योजनाक बात भेल,
देशक बिकाश लेल,
भेटत  मजूर  कतऽ - मिथिला केर  बच्चा ।।

देशक अजादी केर,
सत्तरि अछि लागि रहल,
पर ने  उद्योग  एतए,  नहिञे  छी  धन्धा ।।

सरकारक नीति ई,
नञि जानि केहेन छी,
भोगि रहल कुहरि रहल,  मिथिलाक बच्चा ।।

प्रदेशक जबार भल,
मिथिलाक पात पर,
मड़ुआक  रोटी  अछि,  माँगू  ने  कुच्चा ।।

आन भाग देशक,
जोगार करए पेटक,
पोल्हाबए   कुटुमे  छऽ,  देशे  समुच्चा ।।

हर भाग देशक,
जँ बनतै उत्पादक,
तँऽ  तोँही   कहह,  के  हेतै  उपभोक्ता ।।




'विदेह' १७० अंक ‍१५ जनबरी २०१५ (वर्ष मास ८५ अंक १७०) मे प्रकाशित । बालानां कृतेमे ।

पद्य - ९६ - चन्दाक धन्धा

चन्दाक धन्धा



धियापुता सभ दूइर भऽ रहल,  अपने ठोकि रहल छी  पीठ ।
पढ़बा - लिखबा केर उमेरमे, चन्दा माँगि रहल अछि  ढीठ ।।

सरस्वतीपूजा केर अवसरि,  हाथमे  कलम  आ पोथी नीक ।
पढ़बा - लिखबा छाड़ि कऽ देखू,  चन्दा माँगि रहल निर्भीक ।।

नान्हि – नान्हि टा छौंड़ा – छौंड़ी,  बाँस आ बत्ती हाथ नेने ।
सड़क जाम कऽ चन्दा माँगए,  अपन भविष्यकेँ कात केने ।।

ई  घटना  दृष्टान्त  मात्र  छी,  बैसल छी हम माथ धेने ।
पूजा  हो  वा  ईद – मोहर्रम,  चन्दा केर  सभ साथ धेने ।।

पूजा – पाठ आ धर्म – संस्कृति, हमरा नञि तकरासँ विरोध ।
उचित हरेक संस्कार – संस्कृति, जाधरि ने करइछ गतिरोध ।।

उत्सव – पाबनि – परब – तिहार, जिनगी केर छी रंग हजार ।
बिनु   एकरा  एकरस  जिनगी,  से  हमहूँ  मानै  छी  सरकार !!

पर स्वरूप ई कतेक उचित छी, अपनहिसभ कने करू विचार ।
धियापुता  देशक  भविष्य  छी, कतेक उचित एहेन बेबहार ।।



'विदेह' १७१ अंक ०१ फरबरी २०१५ (वर्ष मास ८६ अंक १७१) मे प्रकाशित ।